झारखंड की राजधानी रांची का एक ऐसा स्थान जहां धर्म के साथ-साथ परंपराओं और इतिहास को एक साथ झारखण्ड के अस्तित्व की गाथा तो बताता है. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में क्या है इतिहास?
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क्या है पहाड़ी मंदिर का इतिहास
PAHADI MANDIR जो रांची शहर के बीचों बीच में स्थित यह एक बहुत ही अत्यधिक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक स्थलों में माना जाता है, जो कि यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। ये मंदिर रांची के मध्य में स्थित एक पहाड़ी पर है जिसके कारण इसे’ पहाड़ी मंदिर ‘ भी कहा जाता है। अधिकांश लोग इसे पहाड़ी मंदिर से जानते हैं, यहां स्थित शिवलिंग भक्तों के गहरी आस्था का केंद्र भी है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं है यहां एक अलग ही आस्था लोगों के मन में जुड़ा हुआ है जो शिव भक्तों के अंतर मन में विराजमान हैं। यह पहाड़ी लगभग 50/60 हजार साल पुरानी है ऐसा माना जाता है, आज जिन्हें हम पहाड़ी मंदिर से जानते हैं वह कभी ” रिची बुरु ” या तिरीबुरु के नाम से भी जाना जाता था जिसका अर्थ “रिची यानी रांची” और “बुरु यानी पहाड़ी” शब्द से जानते थे

बुधवा पाहन समुदाय के लोग इसे नागों के देवता का धाम भी मानते थे
प्राचीन काल में ऐसा जाना जाता था कि यहां के आदिम समुदाय खास कर बुधवा पाहन समुदाय इस स्थान को नागों के देवता का धाम भी मानते थे, यहां पे न ही कोई मंदिर था और न ही शिव मंदिर यहां सिर्फ एक गुफा था जिसमें एक बड़ा सा चट्टान था जिसपे आदिम समुदाय अपनी श्रद्धा से झुक कर दूध समर्पित करते थें। RANCHI PAHADI MANDIR

भारत के आजादी से भी जुड़ा हुआ है यहां का इतिहास
भारत के इतिहास में या यह कह सकते हैं कि शायद दुनिया के इतिहास में यह इकलौता शिव मंदिर है जहां पर हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के दिन धार्मिक झंडा के साथ साथ देश का राष्ट्र ध्वज तिरंगा भी फहराया जाता है।
बुधवा पाहन के वंशज सुरेश पाहन ने बताया कि हमारे पूर्वज ने भारत देश के आजादी के लिए यहां पर अपना बलिदान दिया है। इसीलिए हमारे पूर्वज के नाम पर और उन शहीदों के नाम पर जिन्होंने देश के आजादी के लिए अपना जान को निछावर किया। उनके सम्मान में हरेक साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर इस मंदिर में तिरंगा झंडा फहराया जाता है।
राजस्थान से लाया गया लाल संगमरमर से बनाया हुआ 468 सीढ़ियां लगाया हुआ है, और यह भी दर्शाता है कि श्रद्धालु अपने भगवान के प्रति नेक श्रद्धा और आस्था के साथ बड़े ही आसानी से चढ़ जाते हैं यह केवल पैरों की नहीं भगवान के प्रति लोगों के मन में आस्था का समन्वय स्थापित करता है। लगभग 350 फिट ऊंची इस पहाड़ी पर भगवान शंकर का यह मंदिर सिर्फ ऊंचाई को नहीं बल्कि भगवान और भक्तों के बीच की गहराइयों को भी दर्शाता है।
JAY BHOLENATH


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